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WET Talks

Words From The Wet Soul.

आज मुझे भाव दो ज़रा | WETx JayEnYou Delhi | Shashi Mukherjee

सैटाइरिकल क्रिएशन है। कृपया फ़ेमिनाज़ी एवं भक्त वगेरा दूर रहें।

 

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आज मुझे भाव दो ज़रा।

आज मुझे भाव दो ज़रा,
वरना कल तुम्हे मोलेस्ट करूँगा।
इतने सालो का ज़ीरो-अटेंशन वाला फ्रसट्रेशन
मैं तुम पर ही निकालूंगा॥

मैं तुम्हारे इर्द-गिर्द हूँ
कभी चश्मे में, कभी ब्रेसेस में।
आई आई टी के प्रकोष्ठ में,
टि सि एस के क्यूबिकल में॥

सोशल नाईट में ऑकवर्ड खड़ा
मूवी हॉल में अकेला बैठा।
मजबूरी से मौनसागर में सन्निविष्ट
आज मुझे भाव दे दो ज़रा॥

आज मेरे ड्रेसिंग सेंस का मज़ाक मत उड़ाना,
मेरे बॉडी ऑडर को हेट मत करना।
मेरे अनप्रेसेंटेबिलिटी से दूर मत भागना
मेरे शाइनेस को जज मत करना॥

मैंने भी तोह तुमको चाहा है,
बॉडी शेमिंग से मुक्त किया है;
तुम्हारे ‘शॉपाहोलिक’नेस को स्वीकारा है।
तुम्हारे लिए डॉग पर्सन बना हूँ
‘typ lyk dis’ करना त्यागा हूँ॥

हाँ पता है तुम्हे फ़वाद चाहिए,
और हाँ सेंस ऑफ़ हीउमर भी चाहिए ।
स्पोंटेनियस ना सही ऑबसर्वेशनल ही मेरी
कॉमेडी पसंद करलो ज़रा ।
आज मुझे भाव दे दो ज़रा॥

नज़रअंदाज़ मत करो आज मुझे!

कल तुम्हारी ज़िन्दगी में वापस आऊंगा,
स्टार्ट अप का सीईओ बनके,
कभी पिएचडी गाइड बनके
कभी कास्टिंग डायरेक्टर बनके।

कभी रात को घर पे योगा के लिए बुलाऊंगा,
पीठ के टैटू को सेक्सी बोलके कमर पे हाथ रखूँगा,
कॉफी के बहाने वेस्टलाइन पे कमेंट करूँगा,
वर्कप्लेस में बॉस बनके सेक्सुअली हैरास करूँगा,
ओवर क्राउडेड बस में मुंह छिपाए ग्रोप करूँगा
इतने सालो का ज़ीरो-अटेंशन मैं पल पल में चुकवाऊंगा
ओवरनाइट पावर और सक्सेस का पूरा फ़ायदा उठाऊंगा।

ऐसे ही लेम तरीको से हिट करूँगा तुमपे,
ऐसे ही क्रीपी तरीको से एप्रोच करूँगा तुमको,
चाहे कितनी भी तरक्की क्यों न कर लू,
मैं तोह कल भी रहूँगा गीकपन से भरा।

आज मुझे भाव दो ज़रा।
आज मुझे भाव दे दो ज़रा॥

 

 

Disclaimer – जैसे अनुराग कश्यप को फ्रेम पर ‘नो स्मोकिंग’ टेक्स्ट डालना पसंद नहीं है, वैसे मुझे भी अपनी रचनाओं पर डिस्क्लेमर डालना पसंद नहीं है। फिर भी थोड़ा कुछ लिख ही देता हूँ। यह कविता एक पैरेलल यूनिवर्स के पैरेलल युवक की ज़ुबानी है। पर वह पूरे समुदाय को रप्रींट नहीं करता। कवी को नायक की ऐसी सोच और ऐसे लोगों पर धिक्कार है।

 

 

कॉन्फ्लिक्ट है जनाब! | WETx Aai Aai Tea G | Shashi Mukherjee

कॉन्फ्लिक्ट है जनाब!

प्यार भी करता हूँ, नफ़रत भी। कॉन्फ्लिक्ट है। किसी कलाकार को इससे बेहतर और क्या चाहिए? गुस्सा आता है इन्हें देखकर, इन चिंकी आँखों वालो को। इन अणडिसाइरेबल स्किन टोन वालों को। इन मेनलैंड कल्चर और लैंग्वेज से मिलो दूर रहने वालों को। जब भी गुवाहाटी एयरपोर्ट पर उतरता हूँ। अजी सच तो है। न इनकी शक्ल अच्छी है ना भाषा सहज। क्यों आएं मेनलैंड वाले यहाँ? कैसे कम्युनिकेट करें? क्यों दिखाए इन्हें और इनकी जगहों को बॉलीवुड फिल्मों में? न उन गवारो को इनके बारे में कुछ पता है न यह ख़ुद को उनके सामने प्रेज़ेंट करना जानते हैं।

बस चिल्लाते रहो तुम सब, गधों! तुम्हारे असम फ़्लड्स को भी फुटेज चाहिए न नेशनल न्यूज़ में। वह देखो एक गुड़गाँव फ़्लड हुआ और देश भर में बस उसी के चर्चे होते रहे। मेरे फ़ेसबुक फ़ीड में स्टैंड उप कॉमिक्स के गुड़गाँव फ़्लड जोक्स की जैसे बाढ़ आ गयी। ऐसा क्यों न हो? अरे गुड़गाँव कितना डिसरविन्ग्लि हाइप्ड है भई। कॉर्पोरेट वर्ल्ड है वहाँ, एंजेल इन्वेस्टर्स हैं, स्टार्ट उप वाले हैं, स्टैंड उप के इतने सारे प्रसिद्द वेन्यूस हैं। भारत के भिन्न-भिन्न दिग्गज अक्सर आते जाते रहते हैं गुड़गाँव। तुम्हारे पास क्या है असम वालों? अब यह मत कहना ‘पूरा देश पीता है असम की चाय’। भोसड़ीके हो सकता है यह सच है पर चाय बस पीने से ही मतलब है लोगों को। और वह चाय की एड भी केरल के बागान में फ़िल्माते हैं। गांड मराओ तुम असम वालो। हा हा! और अब वन होर्ण्ड राइनो की बात भी मत निकालना। क्या है इसमें देखने लायक? हर एक राज्य के पास कुछ न कुछ होते ही हैं ख़ास जीव जंतु। बंगाल के बाघ और गुजरात के शेर में फिर भी हेरोइस्म है। राइनो में कौनसा मार्केटेबल-फैक्टर है? और हाँ! तुम्हारा बिहु डांस। नाचते रहो उम्र भर। करते रहो बकचोदी। कितना बोरिंग है। कहाँ भंगड़ा कहाँ बिहु।

बोरींग तो भंगड़ा भी है भाई। अरे कोई भी फ़ोक एंड इंडिजेनियस स्टफ बोरींग है हम अर्बन युथ के लिए। लेकिन उसको ‘कूल’ बनाके पेश करना जानते हैं यह लोग फिल्मों में। और तो और, भंगड़ा करने वाले भी पंजाबी है, देखने वाले भी पंजाबी है, चीयर करने वाले भी, म्यूज़िक डायरेक्टर भी, कोरियोग्राफ़र भी, लिरिसिस्ट भी, सिंगर भी, एक्टर भी, डायरेक्टर भी। तभी बनाते हैं यह ‘पंजाबी वेडिंग सॉन्ग’, ‘लौंग दा लश्कारा’, ‘शावा शावा’ और पता नहीं क्या क्या हर बॉलीवुड फिल्म में एक न एक तो होता है इनका गाना। यही मेकर्स हैं, यही दर्शक हैं। और तो और, तुम्ही नॉर्थ ईस्ट वासी इनके ‘काले चश्मे’ पे नाच भी रहे हो अपने उत्सवों में। क्या बात!

कोई भी आज के चलतु नेशनल न्यूज़ चैनल देखिये, दो चम्मच दिल्ली की सर्दी, दो चम्मच दिल्ली का प्रदुषण, दो चम्मच दिल्ली का पानी, एक-एक चम्मच केजरीवाल और मोदी, थोड़ा शिव सेना, थोड़े बैंस, आधा किलो तन्मय भट, दो लीटर धोनी, एक कटोरा विराट-अनुष्का, फिर मौसम अनुसार साक्षी मालिक, पि.वि. सिंधु, वगैरा। इंडिया का मतलब ही है दिल्ली और बॉम्बे। थोड़ा बहुत बैंगलोर वगैरा भी है। ख़ैर छोड़ो, जब भी ऐसे शहरो में होता हूँ, अक्सर यहां के दोस्तों से बातचीत होती है की कौन कहाँ से है। कोई कहता है बिहार से तो दूसरा कहता है अच्छा लालू के देश से हो। कोई कहता है अहमदाबाद। तो उसे खाखरे और फाफड़े से पहचाना जाता है। कोई कंगना के मंडी से तो कोई अखिलेश के राज्य से। कोई दादा के शहर से तो कोई रहमान के। अब बेटा आती है मेरी बारी। इन्हीबिशन भाईसाहब तो पहले ही आके बैठे हैं सर पर। और फिर मैं बोलता हूँ – “मैं गुवाहाटी से हूँ।” एकदम जैसे पूरा टेम्पो डाउन हो जाता है घंटे भर के कन्वर्सेशन का। हर एक के मुँह से बस एक ध्वनि – “ओह्ह्ह..”, जैसे यह क्या बोल दिया भाई। एकदम आउट ऑफ़ द वर्ल्ड। ऐसा मुँह बनाते हैं जैसे मैंने किसीका रे…सॉरी सॉरी, जैसे मैंने किसीका मर्डर कर दिया। अब मैं किसके शहर से हूँ? भुपेन हज़ारिका के तो नाम तक नहीं सुने होंगे इस टिंडर जनरेशन ने। फिर सवाल आता है – “प्रॉपर गुवाहाटी से?” क्योंकि इम्प्रोपेर गुवाहाटी तो जंगलियों और उग्रवादियों के हैं ना! भाई यह कैसा सवाल है? प्रॉपर इम्प्रोपेर की माँ की आँख। क्या मेरी ग़लती है गुवाहाटी में पैदा होना? और क्या तुम्हारा इसमें कोई हाथ है रणबीर की तुम राज कपूर के घर पैदा हुए?

फिर क्या? ऑक्वर्डनेस शुरू। कैसे रिलेट करवाऊं खुद को इनके साथ? मुझे भी दिलजीत दोसांझ पर झूमना पड़ता है। जगजीत सिंह पर रोना पड़ता है। खुशवंत सिंह पढ़ना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि मैं इनका फैन नहीं हूँ। बट द फ़ीलिंग इज़ नॉट म्यूच्यूअल न ब्रो! क्योंकि भूपेन हज़ारिका और लक्ष्मीनाथ बेज़बरुः को तो यह भारतवासी पहचानते नहीं। अरे सुनो सुनो, इनकी कोई ग़लती नहीं। भला यह कैसे रिलेट करें हमसे? ‘आप की अदालत’ में कभी तरुण गोगोई, हिमंत बिस्व शर्मा, सर्बानंद सोनोवाल को देखा है आपने? कोई नेशनल लेवल पर स्कैम किया इन्होंने? कोई स्कैंडल्स किये? कोई ट्विट्टर वार? तो कैसे जानेगा देश इन्हें? और अगर जान भी जाएंगे तो इन्हें बुलाएगा कौन इनकी टूटी-फ़ूटी हिंदी सुनने और ज़ीरो प्रेजेंटेबिलिटी देखने? देश जब आज़ाद हुआ, तब सारे कम्युनिटी से कोई न कोई ज़रूर गया मुम्बई शहर फिल्मों में अपना योगदान देने। तभी न हम जानते हैं कश्मीर की वादियों के बारे में, बूट पॉलिश से बॉम्बे के बारे में, पड़ोसन से मद्रासियों के बारे में, आनंद से बंगालियों के बारे में। या आज के ही उदाहरण ले लो। दंगल से हरयाणा, राम-लीला से गुजरात, बाजीराव से महाराष्ट्र, पीकू से दिल्ली और बंगाल छाए रहे हमारी सिनेमा और ज़हन में। पंजाब की समस्या पे तो पूरी फिल्म बना डाली ‘उड़ता पंजाब’। क्या नॉर्थ ईस्ट की कहानियाँ फ़िल्मों में दिखाने लायक नहीं हैं? बिलकुल नहीं। अबे कौन देखेगा यह सब? फ़िल्म कैसे बिकेगी? बताओ कभी नागा या मणिपुरी हीरो देखे हो? हीरो जाए भाड़ में कोई यहां के दुकानदार तक नहीं होते अपनी फिल्मो के किरदारों में। ‘पटेल स्टोर्स’ और ‘शर्मा जी की चाट’ के आगे क्या हमारे लेखक कभी बढ़ पाए? पर यह उनकी ग़लती नहीं। तुम्हारी है नॉर्थ ईस्ट वालों।

पर मैं यह सब क्यों सोच रहा हूँ? मुझे क्या प्रॉब्लम है? न मैं इनकी तरह दिखता हूँ न मेरी भाषा ख़राब है। मेरे पास तोह फ़ेयर चांस है मेनलैंड वालो की तरह कुछ कर दिखाने का। मैं क्यों परेशान होउ अपनी डाउनट्रॉड्डेन कम्युनिटी के लिए? पर कैसे? इतना आसान है क्या इतने सालो के नोस्ताल्जिया को भूला देना? देखो अभी यह लिखते वक़्त भी तो मैं भुपेन दा के गाने सुन रहा हूँ। जो अक्सर शामों को हमारे घर में बजा करते थे। कैसे भूला दूं गुवाहाटी शहर को, बम विस्फ़ोट के लिए मशहूर गणेशगुड़ी फ्लाईओवर को, पानबाज़ार के बुक शॉप्स को, उलूबारी के मिठाई की दुक़ानों को, शिलांग की चढ़ाई-निचाई को? कितने ख़ूबसूरत तो है यह सब! प्राणों से भी प्यारे! अजीब कॉन्फ्लिक्ट है बहनचोद।

ठहरो! कौन हँसा रे? अरे! वह देखो अर्नब गोस्वामी मेरी बातों को सुनके हँसते हँसते गिर पड़ा। साथ में पापोन भी है। तिरस्कार की हंसी छेड़ते हुए। अरे बापरे! यहां तोह भरे पड़े हैं – डैनी डेंग्जोंग्पा, दीपान्निता शर्मा अटवाल, रीमा कागति, प्लबिता बोरठाकुर, मैरी कॉम, दीपा कर्मकार, आदिल हुसैन, सीमा बिस्वास, पत्रलेखा पॉल, शिव थापा, सोमदेव देववर्मन, बाइचुंग भुटिया, इरोम शर्मिला, किरण रिजिजू, ज़ुबीन गर्ग और नजाने कितने ऐसे चेहरे मेरी तरफ़ देखते हँसे जा रहे हैं। मेरे जज़्बात का तो मज़ाक बन गया।

कहीं फिर से फ़क अप न हो जाए | WETx AaiAaiTea KayJeePea | Shashi Mukherjee

सुबह १० बजे की बात है। मैं हर शनिवार की तरह बवाना रोड से इलेक्ट्रॉनिक रिक्शा पकड़कर बादली मेट्रो आ रहा था। रिक्शा पहले से ही भरी हुई थी। मैंने हाथ हिलाकर रोका तोह कुछ दूर जाकर रुकी। रिक्शा चालाक ने पुकारा मुझे – “आओ आओ, जल्दी आओ।” मैं उनकी ही सीट में थोड़ा एडजस्ट करके बैठ गया। वे बोलने लगे – “अरे वह बस आ रही थी ना तभी तुम्हारे पास रोक नहीं पाया।” चालक अधेड़ से कुछ ज़्यादा उम्र के थे। हम कुछ दूर पहुंचे तो एक पुल आया। पुल के नीचे छोटी नदी बह रही थी। वहाँ ट्रैफिक क़ाफी था जो धीरे धीरे क्लियर होने लगा। रिक्शा चालक ने इशारे से एक काली गाड़ी को रोकने को कहा ताकि हम पहले निकल जाए। गाड़ी रुकी नहीं और हमारे सामने से निकल गयी। फिर हम भी वहाँ से निकलने लगे। चालक ने मुझे मुस्कुराकर कहा – “छोटे लोगों की कोई नहीं सुनता सर। बड़ी गाड़ी छोटे रिक्शे की कहाँ मानता।” मैंने भी हँसके बोला – “हा! हा! जी बिलकुल! सच बात है।” थोड़ा ठहरकर मैंने फिर बोला – “यहीं तो ज़िन्दगी का…” और मेरी आवाज़ लुप्त हो गयी।

क्यों? सही शब्द मेरे ज़ेहन में नहीं आ रहे थे वाक्य को पूरा करने। और आ भी गए तो यह कन्फर्मेशन कौन प्रेमचंद दें की वह पुल्लिंग शब्द है। ऐसा हर बार होता है मेरे साथ। हिंदी भाषा पर कमांड नहीं है मुझे अब तक। इसलिए बोलचाल में क़ाफी अंडरकॉन्फिडेंट रहता हूँ। क्यों नहीं ऐसा होता की गूगल ऐसी अवस्था में मुझे वर्ड सजेशन्स दें। पर चालक ने खुद ही पूरा कर दिया – “…उसूल है सर।” फिर वह बोलने लगे – “और यह सच बात है। हमें इस नियम को मानकर चलना चाहिए। अगर सभी यह नियम मान ले सर और अपने से बड़ी गाड़ी को पहले जाने दें, तो दुनिया में कोई एक्सीडेंट ही नहीं होगी सर।” मैं बस हाँ में हाँ मिलाने लगा। पीछे की सीटों में दो लड़के एवं दो लडकियां बैठी थी। मेरे ही उम्र के। शायद डी॰टी॰यु॰ के ही होंगे। वह आपस में बात कर रहे थे और उन्हें हमारी बातचीत का कुछ पता न था। चालक फिर बोलने लगे – “पर यह सोच शायद मेरे दिमाग में अब आई है। शायद उम्र ने सिखाया है सर। शायद जवानी में मैं भी उतना ही उग्र और हिंसक था।” मैंने भी हँसके बोला – “जी बहुत अच्छी सोच है।”

पर एक बात मुझे तब से खटक रही थी। कि वह मुझे ‘सर’ क्यों बुला रहे हैं। मुझे लज्जा का अनुभव हो रहा था। मैं सोच रहा था कि उनको बोलूं – “मुझे सर नहीं बेटा बुलाइए।” पर यह कहने में मुझे कह लीजिए शर्म या किसी तरह कि हिचकिचाहट हो रही थी। लेकिन इस बार तो हिंदी भी आसान थी। कोई का-की कन्फ्यूशन नहीं। फिर भी मेरी फट रही थी। अपनी इस एक्सट्रीम हम्बलनेस से मैं बचपन से जूज रहा हूँ। पाने योग्य चीज़ मांग नहीं पाता और अतिरिक्त मना नहीं कर पाता। मुझे डर था कि चालक को यह बात बताते कहीं मेरा फिर से फ़क अप न हो जाए। इतने में पास कि गली से एक स्कूटी निकली जिसे एक जवान लड़का चला रहा था। लड़का वेल बिल्ट और अपमार्केट लुकिंग था। स्कूटी छोटी थी, रिक्शा उससे बड़ी। उसके नज़्दीक पहुँचते ही हमारे रिक्शे कि गति धीमी कर दी गयी। चालक ने इशारा किया कि वह रुके और हम पहले निकले। पर स्कूटीवाला तब तक बड़ी शान से मीटरों दूर पहुँच चुका था। ‘ज़िन्दगी का उसूल’ वाहन का है या सोशल स्टेटस का, मैं बस सोचता ही रह गया।

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